MP News: भोपाल गैंगवार मामले में कुख्यात जुबेर मौलाना समेत पांच आरोपी बरी

भोपाल। राजधानी के बहुचर्चित टीला जमालपुरा फायरिंग और गैंगवार मामले में पुलिस की विवेचना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। अभियोजन पक्ष अदालत में यह साबित नहीं कर सका कि वारदात के दौरान गोली आखिर किस आरोपी ने चलाई थी। साक्ष्यों के अभाव और कमजोर पैरवी के चलते जिला अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए कुख्यात गैंगस्टर जुबेर मौलाना समेत सभी पांच आरोपियों को बरी कर दिया।

करीब 440 दिन तक जेल में रहने के बाद आरोपियों के बरी होने से पुलिस कमिश्नरेट की विवेचना, चार्जशीट और अभियोजन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

पुलिस के अनुसार, घटना 6 मई 2025 को तड़के करीब 5:45 बजे टीला जमालपुरा थाना क्षेत्र के इंद्रानगर में हुई थी। एफआईआर के मुताबिक, गैंगस्टर जुबेर मौलाना अपने साथियों शरीफ उर्फ बच्चा, फैसल खान, सन्नी उर्फ शकील और जहीर खान के साथ घातक हथियारों से लैस होकर वहां पहुंचा था। आरोप था कि क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करने की नीयत से आरोपियों ने हवाई फायरिंग कर दहशत फैलाई और एक युवक पर जानलेवा हमला किया। पुलिस ने हत्या के प्रयास समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर चालान अदालत में पेश किया था।

अदालत में नहीं टिक सकी पुलिस की थ्योरी

करीब डेढ़ वर्ष तक चले इस चर्चित मुकदमे में पुलिस का पूरा मामला अदालत में कमजोर पड़ गया। सुनवाई के दौरान फरियादी, घायल युवक और सभी प्रत्यक्षदर्शी अपने पुलिस को दिए गए बयानों से मुकर गए।

पुलिस का दावा था कि जुबेर मौलाना के पास से एक देसी पिस्टल तथा अन्य आरोपियों के कब्जे से तलवार और चाकू बरामद किए गए थे। हालांकि, जब्ती के स्वतंत्र गवाहों ने अदालत में पुलिस कार्रवाई का समर्थन करने से इनकार कर दिया। अभियोजन पक्ष यह भी साबित नहीं कर सका कि जब्त हथियार प्रतिबंधित श्रेणी के थे और उनकी बरामदगी विधि-सम्मत तरीके से की गई थी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है। प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त और विश्वसनीय नहीं हैं, इसलिए आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

पुलिस जांच पर उठे चार बड़े सवाल

  • यदि मौके पर फायरिंग हुई थी, तो पुलिस यह साबित क्यों नहीं कर सकी कि गोली किस आरोपी के हथियार से चली?
  • जब्ती के स्वतंत्र गवाह अदालत में अपने बयान से क्यों मुकर गए? क्या जब्ती की प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई?
  • इतने गंभीर मामले में चालान पेश करने से पहले क्या साक्ष्यों का पर्याप्त कानूनी परीक्षण किया गया था?
  • क्या गवाहों की सुरक्षा और उन पर संभावित दबाव को रोकने के लिए पुलिस ने प्रभावी कदम उठाए थे?

अब आंतरिक समीक्षा पर नजर

इस फैसले के बाद अब निगाहें पुलिस प्रशासन पर हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पुलिस मुख्यालय और भोपाल पुलिस कमिश्नरेट इस विवेचना में हुई कमियों की आंतरिक समीक्षा कराएंगे। साथ ही, अभियोजन पक्ष की तैयारी और पैरवी में हुई चूकों की भी जांच होगी या नहीं, ताकि भविष्य में गंभीर मामलों में जांच और अभियोजन की तकनीकी खामियों का लाभ उठाकर आरोपी बरी न हो सकें।

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